क्षणिकाएँ
1-
सारी उम्र तरसती रही
मेरी चाहत
दो बूँद प्रेम के लिए
जब उठी मेरी अर्थी
देकर कंधे का सहारा
पिलाकर दो बूँद गंगाजल
तुमने मुक्त कर दिया मुझे
.........प्रेम से '!
2-
'न मिलाओ,
अपने गुरूर में इतना सुरूर ,
बस .. इतना जान लो
मोहब्बत की सोहबतें
हर मगरूर को
जमीं पर उतारने का
हुनर जानती है ''
3-
''प्रेम ,
न जाने तेरे ,
कितने है रूप, और
न जाने ,कितने है नाम।
कोई तुझे पाना चाहता है ,
कोई तुझे चाँद की तरह निहारना ,
मेरे लिए तो तुम्हारा ,
मेरा होना ही ,
प्रेम है ''........
ई .अर्चना नायडू
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