''सौंधी बिरयानी ''
कभी -कभी ये जिंदगी ,
खाली -खाली बर्तन हुआ करती थी ,
बेवजह टकरा टकरा कर ,
शोर मचाया करती थी।
मन की कढ़ाई में कलछुृरी संग ,
कई ख्वाब ,ख्वाइशों के तेल में
पापड़ की तरह तल दिए जाते थे
और तदबीरें खाक हो जाती थी
अब ,ऐ सनम !
तुम्हारे आ जाने से ,
हर्फो की अदावत से ,
अहसासों की तपिश पाकर ,
वही खाली खाली बर्तन
,भरने लगा है।
ख्वाइशों की महक से,
चाहतों का मीठा स्वाद ,
गुलज़ार होने लगा है !
अब तेरे मेरे दिल की आंच पर ,
अल्फ़ाज़ों के मसालों संग ,
कच्चे -पक्के जज़्बातों की ,
मोहब्बत भरी ,
सौंधी सौंधी बिरयानी ,
फिर से पकने लगी है ,!
ई .अर्चना नायडू
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