Friday, September 23, 2016

सौंधी बिरयानी

''सौंधी बिरयानी ''

कभी -कभी ये जिंदगी ,
खाली -खाली बर्तन हुआ करती थी ,
बेवजह टकरा टकरा कर ,
शोर मचाया करती थी। 
मन की कढ़ाई में कलछुृरी संग ,
कई ख्वाब ,ख्वाइशों के तेल में 
पापड़ की तरह तल दिए जाते थे  
और तदबीरें खाक  हो जाती थी 
अब ,ऐ सनम !
तुम्हारे आ जाने से ,
हर्फो की अदावत से ,
अहसासों की तपिश पाकर  ,
वही खाली खाली बर्तन 
,भरने लगा है। 
ख्वाइशों की महक से, 
चाहतों का मीठा स्वाद ,
गुलज़ार होने लगा है !
अब तेरे मेरे दिल की आंच पर ,
अल्फ़ाज़ों के मसालों संग ,
कच्चे -पक्के  जज़्बातों की ,
मोहब्बत भरी ,
सौंधी सौंधी बिरयानी ,
फिर से पकने लगी है ,!

ई .अर्चना नायडू 

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