'सृजन-संवाहक 'हिन्दी. ''
किसी भी भाषा का अस्तित्व ,उसका माधुर्य ,सम्प्रेषण और रचित संसार से ही सिद्ध होता है। हर भाषा अपने आप में अद्वितीय है ,अनोखी है। भाषा की उन्नति और वैभव जनमानस द्वारा बोले जाने वाले संवादों से ही स्थापित होती है ,। इसी श्रेणी में राजभाषा हिंदी ,अपने विचारो और संवादों के सम्प्रेषण के कारण ही लम्बे समय से सृजक संवाहक बनी हुई है इसी लिए हिंदी को राष्ट्र का गौरव कहा जाता है।
आज ,समय का प्रवाह तेजी से बदल कर परिवर्तन चाह रहा है। मगर हमारी जड़े हमारे पैरों तले है। क्योकि जड़ो को काट कर कोई भी उन्नति नहीं कर सकता ,इसीलिए जहा मातृभाषा हमारी मजबूत जड़े है ,वही हिंदी की सहोदरी भाषायें ,जन -जन की संपर्क भाषा बन कर लोगो के बीच सेतु का काम कर रही है। आज वैश्विक भाषा के रूप में अंग्रेजी को व्यवहारिक भाषा का स्थान दिया जा रहा है। इसीलिए इसे भी विश्व भाषा के रूप में समझना जरुरी है। यहाँ इन सारी भाषाओ में दबाव या मज़बूरी से मुक्त सामंजस्य स्थापित होना नितांत आवश्यक है। इन्हे तार्किक धारा से पर ,सरल मन से सहज रूप में स्वीकार करना ही समझदारी होगी ,क्योकि ,जब जब हम हमारी प्रांतीय ,प्रादेशिक भाषा को सम्मान देंगे ,तब तब हम स्वयं सम्मानित होंगे।
परिवर्तन की इस बयार से हिंदी साहित्य भी अछूता नहीं रहा। आज अभिव्यक्तियों के नए मापदंड स्थापित किए जा रहे है। साथ ही हिंदी भाषा भी पहले से ज्यादा उन्मुक्त ,और परिमार्जित हो गई है। हिंदी साहित्य के महामात्य पर विवेचना करने से बेहतर है कि उसके बढ़ते -घटते प्रभाव पर चिंतन किया जाये। यूँ तो हिंदी बोलचाल की भाषा के रूप में सर्वमान्य है। ,वही हिंदी और साहित्य एक दूसरे के पूरक है। जबकि आज जनमानस में हिंदी को साहित्य की धरोहर के रूप में जाना जा रहा है.. सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम होने के बावजूदबरसो पहले जयशंकर प्रसाद जी ने अपने अनुभव और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए कहा था कि ,सिनेमा के आ जाने से सबसे ज्यादा नुकसान साहित्य को होंगा। आज यह बात सौ प्रतिशत सच साबित हो रही है। क्योकि सिनेमा ,टी वी ,ओर इंटरनेट ने साहित्य को बुऱी तरह से धर दबोचा है। कल तक साहित्य को समाज का दर्पण मानने वाले आज टी वी ,सिनेमा मे ही साहित्य खोज़ रहें है,इनसे उत्पन्न मानसिक ,शारीरिक व्याधियाँ अपने दुश्प्रभाव से समाज को प्रभावित कर ही रही है। हर जगह बाज़ारवाद फैला है। मनगढ़ंत कहानिया ,''सनसनी ''बन जाती है,. वही कविताओ या विचार विमर्श जैसे कार्यक्रमो मे अनुभूतियाँ गायब रहतीं है।
साहित्य हमेशा स्वप्रेरणा से लिखा जाता है। क्योकि लेखन अनुभूतियोंकी गहराईओं से उत्पन्न होता है। '' स्वजन हिताय -स्वजन सुखाय '' की भावना ही लेखन का मूल आधार है। शायद इसीलिए हमारे वरिष्ठ साहित्यकारों ने ''कालजयी''रचनाओ से साहित्य सागर भऱ दिया हैं। हा यह भी सच है कि उन्हें न तो पारिश्रमिक क़ी चिंता रहती थी और न ही रायल्टी की। आज ऐसे समर्पित साहित्यकार विरले हीं बचे हैँ ,जिन्होने उंसी खुशबू को बचा ऱखा हैं। बाकी सब व्यवसायीकरण की शिकंजे में फंसते जा रहे है।
ई .अर्चना नायडू
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