अतुल्य शक्तियां .......''''
इस दुनिया में आने वाला हर इंसान अतुल्य शक्तियां और असाधारण प्रतिभा का असीमित भण्डार लिए हुए आता है .मगर अज्ञानतावश और परिस्थितिवश वह अपनी आंतरिक क्षमताओ को जान नहीं पाता. हम सभी जानते है , चौसठ कलाओ से निर्मित इस मानव शरीर में हजारो कलात्मक्ताये छुपी होती है जो हमारी क्रिया शीलता को शिथिल नहीं होने देती, और यही शक्ति हमारी आन्तरिक उर्जा बनकर हमें हर उम्र क पड़ाव पर सकारात्मक सोच के साथ उर्जावान बनाए रखती है .मानव जीवन सदेव ही संघर्षो का ताना बाना समेटे हुए होता है इसीलिए अपने आत्मविश्वास नाम की अनमोल पूंजी को हमेशा संभल कर रखना ज्यादा जरुरी है . सच्चे मन से और अथाह परिश्रम से किया गया हर कार्य हमेशा परिणिति को प्राप्त होता ही है इस बात की गांठ बांध लीजिये..... उम्र के हर मोड़ पर अपनी छोटी बड़ी उम्मीदों को सोलहवें साल की उमंगो की तरह सदा जवाँ रखकर आगे बढ़ते रहिये, देखिये ......फिर केसे अगले ही कदम में सफलता आपके स्वागत में पावडे बिछाये मिलेगी.दुनिया में कोई भी काम असाध्य नहीं है ,यह मानकर हमें अन्दर की उस विशेष प्रतिभा को तलाश कर तराशना होगा, जो अज्ञानता और आलस्यवश मन के किसी कोने में दुबकी पड़ी है, बस !!! अपनी रुचियों और दबी आकांशाओ की धूल हटा कर देखिये आपका छोटा सा प्रयास केसे बड़ी उपलब्धि बनकर असाध्य लक्ष्य को सिरमौर बाना लेता है, इस विलक्षण प्रतिभा को हम "पॉवर ऑफ़ एच " का नाम दे सकते है
पहला एच यानि हमारा "हेड" या मस्तिष्क है जो हमारी बुद्धिमत्ता और चातुर्य का प्रथम केंद्र है जहा से योजनाओ की प्रेरणा और उर्जा मिलती है और कार्य शीलता की शुरुआत होती है. दूसरा एच अर्थात हमारा ह्रदय या "हार्ट" है जो शरीर के उलटे हाथ की तरफ रहता है लेकिन सही निर्णय लेता है इसलिए दिल की पुकार को हमारा विवेक कहा जाता है और दिल से किया गया हर कार्य सम्पूर्णता को प्राप्त होता है. तीसरा एच हमारा हाथ या "हैण्ड" है. दिल और दिमाग से किये गए हर काम को अपनी मंजिल तक पहुचने वाले सबसे सशक्त माध्यम हमारे ये दो हाथ ही है इन्ही तीनो शक्तियों को केन्द्रित करना ही एकमात्र उद्देश है.
अपनी प्राथमिकताओ को ध्यान में रखकर अपना छोटा या बड़ा लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए क्योकि जब लक्ष्य सामने हो तो उस राह पर चलना आसान होता है. छोटी बड़ी रूकावटे भी रrहो में आना जरुरी है यही रोड़े हमारे आत्मविश्वास और दृढ निश्चय को परखते है .अपनी सकारात्मक सोच को हमेशा क्रिया शील रखने से हमारी मानसिक, दैहिक और वैचारिक शिथिलता दूर होती है.
किसी भी कार्य के शुभारम्भ के लिए किसी मुहुर्त का मौका मत देखिये, क्योकि शुभ कार्य किसी शुभ घडी का मोहताज नहीं होता. एक शुभ विचार ही " एक शुभम " की शुरुवात है इसिलए, आइये ......अपने आत्म -मंथन के सागर से अपनी विशेष प्रतिभा के हीरे मोती निकालिए और मन कर्म के आन्तरिक उर्जा को एक नया आकार देकर एक अनोखा ऐसा कार्य कर डालिए, जिसका इंतज़ार हजारो ऑंखें कर रही है. इसी से आपकी प्रतिभा को एक नया नाम मिलेगा, नया आयाम मिलेगा और एक पहचान मिलेगी, आपका व्यक्तित्व और अस्तित्व सारे संसार के लिए एक मिसाल बन जाएगा ...........
प्रेषिका:
ई .अर्चना नायडू