Wednesday, September 28, 2016

क्षणिकायें

क्षणिकाएँ
1-
सारी उम्र तरसती रही 
मेरी चाहत
 दो बूँद प्रेम के लिए 
जब उठी मेरी अर्थी 
देकर कंधे का सहारा 
पिलाकर दो बूँद गंगाजल 
तुमने मुक्त कर दिया मुझे 
.........प्रेम से '! 


2-
'न मिलाओ,
 अपने गुरूर में इतना सुरूर ,
बस .. इतना जान लो 
मोहब्बत की सोहबतें 
हर मगरूर को 
जमीं पर उतारने का 
हुनर जानती है ''


3-
 ''प्रेम ,
न जाने तेरे ,
कितने है रूप, और 
न जाने ,कितने है नाम। 
कोई तुझे पाना चाहता है ,
कोई तुझे  चाँद की तरह निहारना ,
मेरे लिए तो तुम्हारा ,
मेरा  होना ही , 
प्रेम है ''........

ई .अर्चना  नायडू  

Sunday, September 25, 2016

सृजन-संवाहक   हिन्दी

'सृजन-संवाहक   'हिन्दी. ''
 किसी भी भाषा का अस्तित्व ,उसका माधुर्य ,सम्प्रेषण और रचित संसार से ही सिद्ध होता है। हर भाषा अपने आप में अद्वितीय है ,अनोखी है। भाषा की उन्नति और वैभव जनमानस द्वारा बोले जाने वाले संवादों से ही स्थापित होती है ,। इसी श्रेणी में राजभाषा हिंदी ,अपने विचारो और संवादों के सम्प्रेषण के कारण  ही लम्बे समय से सृजक संवाहक बनी हुई है इसी लिए हिंदी को राष्ट्र का गौरव कहा जाता है। 
               आज ,समय का प्रवाह तेजी से बदल कर परिवर्तन  चाह रहा है। मगर हमारी जड़े हमारे पैरों तले  है। क्योकि जड़ो को काट कर कोई भी उन्नति नहीं कर सकता ,इसीलिए जहा मातृभाषा हमारी मजबूत जड़े  है ,वही हिंदी की  सहोदरी भाषायें ,जन -जन  की संपर्क भाषा बन कर लोगो के बीच सेतु का काम कर रही है। आज वैश्विक भाषा के रूप में अंग्रेजी को व्यवहारिक भाषा का स्थान दिया जा रहा है। इसीलिए इसे भी विश्व भाषा के रूप में समझना जरुरी है। यहाँ इन सारी  भाषाओ में दबाव या मज़बूरी से मुक्त सामंजस्य स्थापित होना नितांत आवश्यक है। इन्हे तार्किक धारा  से पर ,सरल मन से सहज रूप में स्वीकार करना ही समझदारी होगी ,क्योकि ,जब जब हम हमारी  प्रांतीय ,प्रादेशिक भाषा को सम्मान देंगे ,तब तब हम स्वयं सम्मानित होंगे। 
         परिवर्तन की इस बयार से हिंदी साहित्य भी अछूता नहीं रहा। आज अभिव्यक्तियों के नए मापदंड स्थापित किए जा रहे है। साथ ही हिंदी भाषा भी पहले से ज्यादा उन्मुक्त ,और परिमार्जित हो गई है। हिंदी साहित्य के महामात्य पर विवेचना करने से बेहतर है कि उसके बढ़ते -घटते प्रभाव पर चिंतन किया जाये। यूँ  तो हिंदी बोलचाल की भाषा के रूप में सर्वमान्य है। ,वही हिंदी और साहित्य एक दूसरे के पूरक है। जबकि आज जनमानस  में हिंदी को साहित्य की धरोहर के रूप में जाना जा रहा है.. सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम होने के बावजूदबरसो पहले जयशंकर प्रसाद जी ने अपने अनुभव और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए कहा था कि ,सिनेमा के आ जाने से सबसे ज्यादा नुकसान साहित्य को होंगा। आज यह बात सौ प्रतिशत सच साबित हो रही है। क्योकि सिनेमा ,टी वी ,ओर इंटरनेट ने साहित्य  को बुऱी  तरह से धर दबोचा है। कल तक साहित्य को समाज का दर्पण मानने वाले आज टी वी ,सिनेमा मे ही साहित्य खोज़ रहें है,इनसे उत्पन्न मानसिक  ,शारीरिक व्याधियाँ अपने दुश्प्रभाव से समाज को प्रभावित कर ही रही है। हर  जगह बाज़ारवाद फैला है। मनगढ़ंत कहानिया ,''सनसनी ''बन  जाती  है,. वही कविताओ या विचार विमर्श जैसे कार्यक्रमो मे अनुभूतियाँ गायब रहतीं है। 
            साहित्य हमेशा स्वप्रेरणा से लिखा जाता है। क्योकि लेखन अनुभूतियोंकी गहराईओं से उत्पन्न होता है। '' स्वजन हिताय -स्वजन सुखाय '' की भावना ही लेखन का मूल आधार है। शायद इसीलिए हमारे वरिष्ठ साहित्यकारों ने ''कालजयी''रचनाओ से साहित्य सागर भऱ दिया हैं। हा यह भी सच है कि उन्हें न तो  पारिश्रमिक क़ी चिंता रहती थी और न ही रायल्टी की। आज ऐसे समर्पित साहित्यकार विरले हीं  बचे हैँ  ,जिन्होने उंसी खुशबू को बचा ऱखा  हैं। बाकी  सब व्यवसायीकरण की शिकंजे में फंसते जा रहे है। 

ई .अर्चना नायडू 

Friday, September 23, 2016

सौंधी बिरयानी

''सौंधी बिरयानी ''

कभी -कभी ये जिंदगी ,
खाली -खाली बर्तन हुआ करती थी ,
बेवजह टकरा टकरा कर ,
शोर मचाया करती थी। 
मन की कढ़ाई में कलछुृरी संग ,
कई ख्वाब ,ख्वाइशों के तेल में 
पापड़ की तरह तल दिए जाते थे  
और तदबीरें खाक  हो जाती थी 
अब ,ऐ सनम !
तुम्हारे आ जाने से ,
हर्फो की अदावत से ,
अहसासों की तपिश पाकर  ,
वही खाली खाली बर्तन 
,भरने लगा है। 
ख्वाइशों की महक से, 
चाहतों का मीठा स्वाद ,
गुलज़ार होने लगा है !
अब तेरे मेरे दिल की आंच पर ,
अल्फ़ाज़ों के मसालों संग ,
कच्चे -पक्के  जज़्बातों की ,
मोहब्बत भरी ,
सौंधी सौंधी बिरयानी ,
फिर से पकने लगी है ,!

ई .अर्चना नायडू 

Tuesday, September 20, 2016

अतुल्य शक्तियां .......''''

अतुल्य शक्तियां .......''''

इस दुनिया में आने वाला हर इंसान अतुल्य शक्तियां और असाधारण प्रतिभा का असीमित भण्डार लिए हुए आता है .मगर अज्ञानतावश और परिस्थितिवश वह अपनी आंतरिक क्षमताओ को जान नहीं पाता. हम सभी जानते है , चौसठ कलाओ से निर्मित इस मानव शरीर में हजारो कलात्मक्ताये छुपी होती है जो हमारी क्रिया शीलता को शिथिल नहीं होने देती, और यही शक्ति हमारी आन्तरिक उर्जा बनकर हमें हर उम्र क पड़ाव पर सकारात्मक सोच के साथ उर्जावान बनाए रखती है .मानव जीवन सदेव ही संघर्षो का ताना बाना समेटे हुए होता है इसीलिए अपने आत्मविश्वास नाम की अनमोल पूंजी को हमेशा संभल कर रखना ज्यादा जरुरी है . सच्चे मन से और अथाह परिश्रम से किया गया हर कार्य हमेशा परिणिति को प्राप्त होता ही है इस बात की गांठ बांध लीजिये..... उम्र के हर मोड़ पर अपनी छोटी बड़ी उम्मीदों को सोलहवें साल की उमंगो की तरह सदा जवाँ रखकर आगे बढ़ते रहिये, देखिये ......फिर केसे अगले ही कदम में सफलता आपके स्वागत में पावडे बिछाये मिलेगी.दुनिया में कोई भी काम असाध्य नहीं है ,यह मानकर हमें अन्दर की उस विशेष प्रतिभा को तलाश कर तराशना होगा, जो अज्ञानता और आलस्यवश मन के किसी कोने में दुबकी पड़ी है, बस !!! अपनी रुचियों और दबी आकांशाओ की धूल हटा कर देखिये आपका छोटा सा प्रयास केसे बड़ी उपलब्धि बनकर असाध्य लक्ष्य को सिरमौर बाना लेता है, इस विलक्षण प्रतिभा को हम "पॉवर ऑफ़ एच " का नाम दे सकते है

पहला एच यानि  हमारा "हेड" या मस्तिष्क है जो हमारी बुद्धिमत्ता और चातुर्य का प्रथम केंद्र है जहा से योजनाओ की  प्रेरणा और उर्जा मिलती है और कार्य शीलता की शुरुआत  होती है. दूसरा एच अर्थात हमारा ह्रदय या "हार्ट" है जो शरीर के उलटे हाथ की तरफ रहता है लेकिन सही निर्णय लेता है इसलिए दिल  की पुकार को हमारा विवेक कहा जाता है और दिल से किया गया हर कार्य सम्पूर्णता को प्राप्त होता है. तीसरा एच हमारा हाथ  या "हैण्ड" है. दिल और दिमाग से किये गए हर काम को अपनी मंजिल तक पहुचने वाले सबसे सशक्त माध्यम हमारे ये दो हाथ ही है इन्ही तीनो शक्तियों को केन्द्रित करना ही एकमात्र उद्देश है.

अपनी प्राथमिकताओ को ध्यान में रखकर अपना छोटा या बड़ा लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए क्योकि जब लक्ष्य सामने हो तो उस राह पर चलना आसान होता है. छोटी बड़ी रूकावटे भी रrहो में आना जरुरी है  यही रोड़े हमारे आत्मविश्वास और दृढ निश्चय को परखते है .अपनी सकारात्मक सोच को हमेशा क्रिया शील रखने से हमारी  मानसिक, दैहिक और वैचारिक शिथिलता दूर होती है.
किसी भी कार्य के शुभारम्भ के लिए किसी मुहुर्त का मौका मत देखिये, क्योकि शुभ कार्य किसी शुभ घडी का मोहताज नहीं होता. एक शुभ विचार ही " एक शुभम " की शुरुवात है इसिलए, आइये ......अपने आत्म -मंथन के सागर से अपनी विशेष प्रतिभा के हीरे मोती निकालिए और मन कर्म के आन्तरिक उर्जा को एक नया आकार देकर एक अनोखा ऐसा कार्य कर डालिए, जिसका इंतज़ार हजारो ऑंखें कर रही है. इसी से आपकी प्रतिभा को एक नया नाम मिलेगा, नया आयाम मिलेगा और एक पहचान मिलेगी, आपका व्यक्तित्व और अस्तित्व सारे संसार के लिए एक मिसाल बन जाएगा ...........

प्रेषिका:
ई .अर्चना नायडू