Friday, September 29, 2017

इसीलिए रावण कभी मरता नही

ढेर सारा उत्साह और उमंग लेकर दशहरा पर्व आता है ,साथ मे बुराई पर अच्छाई की विजय का जय उदघोष करता रहता है ।
कहा जाता है कि भगवान राम ने नवरात्रि की पूजन अर्चन के बाद दसवें दिन अहंकारी रावण का वध अपने तीसवें तीर से किया था ।जो रावण के नाभि में स्थित अमृत कुंड को नष्ट कर देता है।
यूँ देखा जाए ,तो हम सब के मन मे बुराइयों का रावण हमेशा विधमान रहता है,अहंकार,मदमोह,द्वेष ईर्ष्या, कपट,झूठ, मक्कारी ,और न जाने कितने दुर्गुणों की खान है ,हमारा यह मानव शरीर ।फिर भी हम मन कर रावण को मारने के बदले कागज के पुतले को जलाकर हर्षित हो जाते है ।दुर्गा माँ की पूजा भगवान राम में आस्था के साथ अगर हम एक या दो मन मे बसे बुराइयों के रावण को मारने का प्रण ले ,तो संभवतः अंत तक हम मोक्ष के द्वार तक जा ही सकते है ।
व्यसन का त्याग और इंद्रियों पर संयम हम दसदिनी मैच की तरह ही क्यों निभाते है ।नौ दिनी व्रत और उपवास का दसवें दिन अंत हो जाता है
रावण के मरने का उत्सव हम
बुराइयों को साथ लेकर मानते है हमारे धर्म और सत्कर्म पर मोह लालसा,लोभ हावी हो जाता है ।और हमारी दिनचर्या फिर से रावणी हो जाती है ।
कहा जाता है हमारे विचार ही हमारे चरित्र को सदृढ़ बनाते है ।फिर हम क्यों दुर्बल होकर अच्छे कर्मों की सूची को मिटा कर फिर से बुराई की पंक्ति में खड़े हो जाते है।
तो चलिए,क्यो न इस साल नए सिरे से मन मे बसे बुरी आदतों और बुरे कर्मो के एकाध रावण को मारने की एक अच्छी शुरुआत करें।
यूँ तो मन मे बसे रावण को मारना आसान नही होगा ,फिर भी आत्मनियंत्रण ,और आत्मविश्वास को साथ लेकर एक मजबूत कदम तो रखा जा ही सकता है।हम स्वयं ही अपना नियंत्रण परिस्थिति और लचीले व्यवहार को सौप कर हार मान लेते है ।
दशहरा आत्मशुद्धि और आत्मवलोकन का पर्व है अपनी बुराइयों को जीतने का त्योहार है ,केवल उपवास कर लेने ,साबूदाने की खिचड़ी की खिचड़ी खा लेने या माता से अभय दान मांग लेने या रावण के कागज़ के पुतले को जला देना ही विजयादशमी नही है ,बल्कि अपने कर्म पर ,अपने मन पर सच्चाई और सत्कर्मो की सत्ता स्थापित करना ही सही दशहरा है ।
ई.अर्चना नायडू
भोपाल  ।